दुःख
एक बार भगवान ने दुःख से पूछा कि तू मेरे बन्दो को क्यों सताता है? दःख ने कहा - ' भगवान ! मैं कहाँ किसी को सताता हूँ । मैं तो स्वयं चल के किसी के पास नहीं आता । आपके बन्दे स्वयं ही मुझे बुलाते है तो मैं चला आता हूँ ।
आज का युग भौतिकवादी युग है । भौतिक सुख आज के जीवन का आशीर्वाद अंग बन गए हैं। आज भौतिक सुखो को पाना ही मानव का एकमात्र लक्ष्य बन गया है। हर व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति से असंतुष्ट है। और अधिक पाने की लालसा बढ़ती जा रही है।
सुख पाने की चाह में हम दुःखो को लगातार
बढ़ाते जाते है । दुःख का एक रूप चिन्ता भी
हैं। उसके पास अमुक चीज है, मेरे पास नहीं है ।
उसे पाने का दुःख या चिन्ता हमें सताने लगती
है कि कैसे पाऊँ । दुःख और चिन्ता का यह क्रम लगातार चलता रहता है । जब तक आपके मन में संतोष और शान्ति नहीं होगी तब तक आप सबकुछ पाकर भी दुःखी रहेंगे ।
धन्यवाद ।


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