।।कीर्तन।।
बहुत ही विडम्बना है कि आजकल भगवान के कीर्तन आदि में भी श्रद्वा की भावना कम एवं दिखावा (आडम्बर) ज्यादा हो गया है।
आयोजक कई लाखो का बजट बना लेते है। अपने को बड़ा दिखाने की होड़ में श्रृंगार एवं साज -सज्जा पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। प्रसाद के नाम पर दिवा-रात्रि भोज का
आयोजन है ।
क्या ये अच्छा नहीं होता कि यह पैसा किसी परमार्थ के काम
में लगाया जाता। भगवान तो भाव के भूखे होते है-आडम्बर के
नहीं । शर्बरी के बेर, सुदामा के तन्दुल, विदुर के घर साग एवं
करमा बाई के खिचड़ा में भाव ही थे, जिनके कारण प्रभु को
स्वयं साक्षात आकर ग्रहण करना पड़ा ।
भगवान का कीर्तन करने वालो को सदाचारी होना चाहिए,
आडम्बरी नहीं ।
धन्यवाद ।
बहुत ही विडम्बना है कि आजकल भगवान के कीर्तन आदि में भी श्रद्वा की भावना कम एवं दिखावा (आडम्बर) ज्यादा हो गया है।
आयोजक कई लाखो का बजट बना लेते है। अपने को बड़ा दिखाने की होड़ में श्रृंगार एवं साज -सज्जा पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। प्रसाद के नाम पर दिवा-रात्रि भोज का
आयोजन है ।
क्या ये अच्छा नहीं होता कि यह पैसा किसी परमार्थ के काम
में लगाया जाता। भगवान तो भाव के भूखे होते है-आडम्बर के
नहीं । शर्बरी के बेर, सुदामा के तन्दुल, विदुर के घर साग एवं
करमा बाई के खिचड़ा में भाव ही थे, जिनके कारण प्रभु को
स्वयं साक्षात आकर ग्रहण करना पड़ा ।
भगवान का कीर्तन करने वालो को सदाचारी होना चाहिए,
आडम्बरी नहीं ।
धन्यवाद ।
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