बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

।। क्या आप जानते है?

चाक:अध्यापक की तलवार है।

झगड़ा:वकीलो का कमाऊ बेटा है।

किरायेदार:मकान मालिक के लिए मंलेरिया का बुखार है।

अतिथि:बिना पूर्व सूचना के बजट की सफाई करने वाला है।

पश्चाताप:अपराध धोने का साबुन है।

एन्टीना:कबतूरों का विश्राम स्थल है।

गुस्सा:अक्ल को खो जाता है।

अहंकार:मान को खो जाता है।

चिन्ता:आयु को खो जाती है।

रिश्वत:इंसान को खा जाती है।

लालच:ईमान को खा जाती है।

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

।। कीर्तन ।।

      ।।कीर्तन।।

बहुत ही विडम्बना है कि आजकल भगवान के कीर्तन आदि में भी श्रद्वा की भावना कम एवं दिखावा (आडम्बर) ज्यादा  हो गया है।
   
आयोजक कई लाखो का बजट बना लेते है। अपने को बड़ा दिखाने की होड़ में श्रृंगार एवं साज -सज्जा पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। प्रसाद के नाम पर दिवा-रात्रि भोज का
आयोजन है ।

क्या ये अच्छा नहीं होता कि यह पैसा किसी परमार्थ  के काम
में लगाया जाता। भगवान तो भाव के भूखे होते है-आडम्बर के
नहीं । शर्बरी के बेर, सुदामा के तन्दुल, विदुर के  घर साग एवं
करमा बाई के खिचड़ा में भाव ही थे, जिनके कारण प्रभु को
स्वयं साक्षात आकर ग्रहण करना पड़ा ।

भगवान का कीर्तन करने वालो को सदाचारी होना चाहिए,
आडम्बरी नहीं ।


धन्यवाद ।

सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

।।इनके लिए जीवन क्या है ।।

       इनके लिए जीवन क्या है।

 कैदी के लिए जीवन एक बंधन है।
   
  मजदूर के लिए जीवन एक श्रम है।

  आचार्य के लिए जीवन एक कर्तव्य है।

  प्राचार्य के लिए जीवन एक शिक्षा का मूल है।

 अमीर के लिए जीवन धन का संग्रह है।

 बालक के लिए जीवन एक जिज्ञासा है।

 सिंह के किए जीवन स्वतंत्रता है।

 राजकुमार के लिए जीवन फूलों की सेज है।

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

।। ज्ञानामृत ।।

    ज्ञानामृत ।

लेना चाहते हो तो आशीर्वाद लो।

देना चाहते हो तो अभय दान दो।

खाना चाहते हो तो क्रोध अौर गम खाओं।

मारना चाहते हो तो बुरे विचारो को मारो।
               
                जानना चाहते हो तो भगवान को जानो
     
               जीतना चाहतो हो तो तृष्णाओं को जीतो।    
           
              पहनना चाहते हो तो नेकी का जामा पहनों ।
 
             करना चाहते हो तो दीन-दुखियों की सेवा करो ।

छोड़ना चाहते हो तो झूठ बोलना छोड़ दो।

बोलना चाहते हो तो मीठी वाणी बोलो ।

देखना चाहते हो तो अपने अवगुण देखो ।

चलना चाहते हो तो सन्मार्ग पर चलो ।
         पहचानना चाहते हो तो अपने आप को पहचानो।


       धनयवाद।

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

।। मितव्ययिता ।।

      ।।

हर व्यक्ति को सुविधाओं का उपयोग करते समय मितव्ययिता
का ध्यान रखना चाहिए। यह समष्टिवादी दृष्टिकोण अपनाकर
ही हमें सबका ध्यान रखना चाहिए ।

साद्यनाजीवन जीने की कला का नाम है ।जो मानव अस्तित्व की गरिमा समझ सका और उसे अनगढ़ स्थिति से निकाल कर
सुसंस्कृत पद्वति से जी सका उसे सोर्वापरि  कलाकार कहते है ।
मेहनत  और तेज दिमाग दोनों यदि किसी व्यक्तिके पास हो तो  दुनिया के किसी भी कोने मे रहकर रोजीरोटी कमा सकता है और खुश रह सकता है।

आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसो हम सफलता के
नजदीक आते ही जा रहे है । तू कैसा पागल है कि सफलता
के इतना पास आकर हार मान बैठा है जबकि हम जीत के
बिल्डा

सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

।।गर्व या नम्रता ।।.

          गर्व या नम्रता ।

पानी से भरे घड़े के ऊपर रखी हुई छोटी सी कटोरी ने एक दिन घड़े से कहा कि "तुम प्रत्येक बर्तन को, चाहे वह छोटा हो या बड़ा ,अपने शीतल जल से भर देते हो, किसी को भी खाली नहीं जाने देते,परन्तु मुझे कभी नहीं भरते,जबकि मैं सदा तुम्हारे सिर पर रहती हूँ आैर दूसरे सब बर्तन मेरे नीचे रहते हैं।
इतना पक्षपात क्यों? " 
   
              घड़े ने शांत स्वर में उतर दिया, " इसमें पक्षपात की कोई बात नहीं है। अन्य सब बर्तन मेरे पास आकर झुकते हैं, 
जिससे मैं उन्हें अपने शीतल जल से भर देता हूँ, परन्तु तुम तो
कभी झुकती नहीं,गर्व से चूर हमेशा मेरे सिर पर सवार रहती हो, इसलिए मैं तुम्हें भर नहीं पाता ।यदि तुम भी नम्रता से जरा
झुकना सीखो तो तुम भी खाली नहीं रहोगी । नम्रता से ही महानता प्राप्त होती है।"
   
    नम्र व्यक्ति सदा सुखी रहता है।

       धन्यवाद।

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

संचय ।।

       संचय।
महान सम्राट सिकन्दर ने जीवन में विपुल सम्पदा एकत्रित की थी । मरने लगा तो इसने सारा खजाना आँखो के सामने खुलवा कर रखा । दरबारियों से कहा किऐसा उपाय करो कि
यह सारा इसी रूप में मेरे साथ परलोक जा सके?

बहुत सोचने पर भी ऐसा कोई उपाय न निकल सका । तब
सिकन्दर ने अपनी मृत्यु के समय जनाजे में से दोनों हाथ खुले
और बाहर रखने की व्यवस्था की, ताकि लोग समझ सकें कि मनुष्य खाली हाथ आता है और उसे खाली हाथ ही जाना पड़ता है । कफन में जेब नहीं होती ।

इससे यह भी शिक्षा मिलती है कि अनावश्यक संचय के लिए
कोई पापकर्म न करें । आज तक किसी भी जाती धर्म का
व्यक्ति ऐसा नही है जो मरते समय सब कुछ साथ ले गया हो ।
जितना समय अनावश्यक संग्रह के लिए लगाया जाता है उतना यदि सत्कर्म में लगाया जा सके तो उससे लोक परलोक
दो

किताबें

गुरू